जिनकी बुद्धि उसी में लगी है, जिनका आत्मभाव उसी में रमा है, जो उसी में निष्ठा रखते हैं और उसी को परम लक्ष्य मानते हैं, ज्ञान से जिनके सारे दोष धुल चुके हैं, वे उस अवस्था को प्राप्त होते हैं जहाँ से लौटना नहीं होता।
व्याख्या
कृष्ण पिछले श्लोक की बात आगे बढ़ा रहे हैं, जहाँ आत्मज्ञान को सूर्य की तरह प्रकाशित करने वाला कहा गया है। "तत्" का अर्थ वह परम सत्य है, यानी ब्रह्म या आत्मा, जिसे ज्ञान से जाना जाता है। जिनकी बुद्धि, भाव, निष्ठा और लक्ष्य सब उसी में स्थित हैं, उनके दोष (कल्मष) ज्ञान से धुल जाते हैं और वे मोक्ष पाते हैं, जहाँ से पुनर्जन्म में वापसी नहीं होती (अपुनरावृत्ति)। अद्वैत व्याख्याएँ "तत्" को निराकार आत्मा या ब्रह्म मानती हैं, जबकि भक्ति परंपराएँ इसे स्वयं भगवान मानती हैं।