…बोलते, छोड़ते, पकड़ते, यहाँ तक कि आँखें खोलते और मूँदते हुए भी, वह यही समझता है कि इंद्रियाँ ही अपने विषयों के बीच बरत रही हैं।
व्याख्या
कृष्ण यहाँ पिछले श्लोक में शुरू हुआ वाक्य पूरा करते हैं। योग में स्थित तत्त्वज्ञानी (युक्त तत्त्ववित्) बोलने, पकड़ने या पलक झपकाने जैसे साधारण कर्मों में भी स्वयं को कर्ता नहीं मानता। वह देखता है कि इंद्रियाँ ही अपने विषयों (इंद्रियार्थ) के बीच काम कर रही हैं। टीकाकार इसे अलग ढंग से पढ़ते हैं: कुछ इसे आत्मा की अकर्तृता में स्थित पुरुष का अनुभव मानते हैं, और कुछ कर्मयोगी के लिए अनासक्ति का व्यावहारिक भाव।