कर्मों का संन्यास और कर्मयोग, दोनों ही परम कल्याण देने वाले हैं। परंतु इन दोनों में कर्मों के संन्यास की अपेक्षा कर्मयोग श्रेष्ठ है।
व्याख्या
अर्जुन ने अभी पूछा था कि कर्मों का त्याग (संन्यास) श्रेष्ठ है या कर्मयोग, यानी फल की आसक्ति छोड़कर कर्म करना। कृष्ण कहते हैं कि दोनों ही मोक्ष रूपी परम कल्याण (निःश्रेयस) की ओर ले जाते हैं, फिर भी वे कर्मयोग को श्रेष्ठ बताते हैं। परंपराएँ इसे अलग ढंग से समझती हैं: कुछ दोनों को एक ही लक्ष्य के दो मार्ग मानती हैं, तो कुछ कर्मयोग को संन्यास की तैयारी मानती हैं।