अर्जुन
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि । यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥
saṃnyāsaṃ karmaṇāṃ kṛṣṇa punaryogaṃ ca śaṃsasi | yacchreya etayorekaṃ tanme brūhi suniścitam ||
हे कृष्ण, आप कर्मों के संन्यास की प्रशंसा करते हैं और फिर कर्मयोग की भी। इन दोनों में जो एक निश्चित रूप से अधिक कल्याणकारी हो, वही मुझे स्पष्ट बताइए।
व्याख्या अर्जुन उलझन में है, क्योंकि कृष्ण ने कर्मों के त्याग (संन्यास) और योग, यानी फल की आसक्ति छोड़कर किए जाने वाले कर्म, दोनों की बात की है। वह पूछता है कि इनमें से कौन-सा मार्ग सच में श्रेय (परम कल्याण) की ओर ले जाता है। कृष्ण इसका उत्तर अगले श्लोक में देते हैं।
पिछला श्लोक 4.42 अध्याय 5 · कर्म-संन्यास अगला श्लोक 5.2
भगवद्गीता के बारे में
भगवद्गीता, संस्कृत में श्रीमद्भगवद्गीता (Śrīmad Bhagavad Gītā ), अर्थात् “भगवान का गीत”, महाभारत के भीष्म पर्व का एक संवाद है, जिसमें 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में, युद्ध आरंभ होने से ठीक पहले, अपने ही स्वजनों से लड़ने के विचार से अर्जुन का मन टूट जाता है, और उसके सारथी श्रीकृष्ण उसे उत्तर देते हैं: कर्तव्य पर, फल की आसक्ति के बिना कर्म करने पर, ज्ञान, ध्यान और भक्ति पर। संजय यह संवाद नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र को सुनाते हैं। इसे भगवद् गीता, भगवत गीता, श्रीमद् भगवद् गीता या श्रीमद्भगवद्गीता भी लिखा जाता है, और प्रायः केवल गीता कहा जाता है।
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