इसलिए, हे भारत, अज्ञान से उत्पन्न और हृदय में बैठे अपने इस संशय को ज्ञान की तलवार से काट डालो। योग का आश्रय लो और उठ खड़े हो।
व्याख्या
अध्याय के अंत में कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि अब जो सिखाया गया है, उसके अनुसार कर्म करो। अज्ञान से जन्मा संशय हृदय में बैठा है, और ज्ञान उसे काटने वाली तलवार है। यहाँ योग को प्रायः कर्मयोग समझा जाता है, यानी फल की आसक्ति छोड़कर किया गया अनुशासित कर्म, जबकि अद्वैत की व्याख्या में आत्मज्ञान को केंद्र में रखा जाता है। "उठ खड़े हो" अर्जुन के सामने खड़े युद्ध के कर्तव्य की ओर संकेत करता है।