जो लोग जिस भाव से मेरी शरण में आते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार अपनाता हूँ। हे पार्थ, सभी मनुष्य हर प्रकार से मेरे ही मार्ग पर चलते हैं।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने उन लोगों की बात की जो राग, भय और क्रोध से मुक्त होकर उनकी शरण में आए। यहाँ वे कहते हैं कि जो जिस भाव से उनके पास आता है, वे उसी रूप में उसे स्वीकार करते हैं (भजन यानी प्रत्युत्तर में स्नेह या कृपा)। लोग जो भी मार्ग चुनें, वे अंततः उन्हीं के मार्ग का अनुसरण करते हैं। परंपराओं में इसकी व्याख्या अलग है: कुछ इसे ईश्वर की समदर्शी कृपा मानती हैं, तो कुछ साधक की अपनी भावना को फल का आधार बताती हैं।