कुछ लोग कान आदि इंद्रियों को संयम की अग्नियों में आहुति के रूप में अर्पित करते हैं। दूसरे लोग शब्द आदि विषयों को इंद्रियों की अग्नियों में अर्पित करते हैं।
व्याख्या
कृष्ण यज्ञ के अनेक प्रकार गिनाते हुए यहाँ बाहरी अग्नि-कर्म के बजाय आंतरिक साधनाओं का वर्णन करते हैं। पहले प्रकार में साधक इंद्रियों पर संयम रखता है, ताकि वे बाहर न भागें। दूसरे में शब्द जैसे विषय इंद्रियों तक आते हैं, पर साधक उन्हें आहुति मानकर राग-द्वेष से प्रतिक्रिया नहीं करता। टीकाकार इन दोनों के संबंध को अलग-अलग ढंग से समझाते हैं, जैसे एक को इंद्रिय-निग्रह और दूसरे को अनासक्त भाव से विषय-सेवन, पर दोनों को आत्म-अनुशासन का रूप मानते हैं।