इस प्रकार परंपरा से प्राप्त हुए इस योग को राजर्षियों ने जाना। परंतु हे परंतप, बहुत लंबा समय बीतने से वह योग इस लोक में नष्ट हो गया।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि यह योग विवस्वान से मनु और इक्ष्वाकु तक पहुँचा, फिर राजर्षियों (राजा होते हुए ऋषि) ने इसे जाना। समय के साथ गुरु-शिष्य की यह परंपरा टूट गई। यहाँ योग का अर्थ ज्ञान से जुड़ा निष्काम कर्म का मार्ग है; टीकाकारों में मतभेद है कि इसका ज़ोर कर्मयोग पर है या मुक्ति के व्यापक मार्ग पर। "परंतप" यानी शत्रुओं को तपाने वाला, अर्जुन का संबोधन है।