तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥
tadviddhi praṇipātena paripraśnena sevayā |upadekṣyanti te jñānaṃ jñāninastattvadarśinaḥ ||
उस ज्ञान को विनम्रता से प्रणाम करके, जिज्ञासा से प्रश्न करके और सेवा करके जान लो। तत्त्व को देखने वाले ज्ञानी जन तुम्हें उस ज्ञान का उपदेश देंगे।
व्याख्या
कृष्ण ने अभी कहा कि ज्ञान-यज्ञ द्रव्यमय यज्ञ से श्रेष्ठ है। अब वे अर्जुन को बताते हैं कि यह ज्ञान कैसे मिलता है: विनम्र प्रणाम (प्रणिपात), सच्चे प्रश्न (परिप्रश्न) और सेवा द्वारा उन गुरुओं से, जिन्होंने तत्त्व को साक्षात् देखा है। ऐसे गुरु की पहचान को लेकर परंपराओं में भिन्न मत हैं, पर सभी मानते हैं कि सीखने के लिए नम्रता और ईमानदार जिज्ञासा चाहिए।