परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥
paritrāṇāya sādhūnāṃ vināśāya ca duṣkṛtām |dharmasaṃsthāpanārthāya saṃbhavāmi yuge yuge ||
सज्जनों की रक्षा के लिए, दुष्कर्म करने वालों के विनाश के लिए और धर्म को दृढ़ रूप से स्थापित करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।
व्याख्या
अर्जुन को उत्तर देते हुए कृष्ण बताते हैं कि जब-जब धर्म (नैतिक और सृष्टि-व्यवस्था) की हानि होती है, वे क्यों प्रकट होते हैं। वे तीन उद्देश्य गिनाते हैं: साधुओं (सज्जनों) की रक्षा, दुष्कर्मियों का नाश और धर्म की पुनः स्थापना। "संभवामि" (प्रकट होता हूँ) को परंपराएँ अलग ढंग से समझती हैं: भक्ति-परंपराएँ इसे ईश्वर का वास्तविक अवतार मानती हैं, जबकि अद्वैत जैसी धाराएँ इसे माया के द्वारा हुआ प्राकट्य मानती हैं।