अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ॥
ajo'pi sannavyayātmā bhūtānāmīśvaro'pi san |prakṛtiṃ svāmadhiṣṭhāya saṃbhavāmyātmamāyayā ||
मैं अजन्मा हूँ, मेरा स्वरूप अविनाशी है और मैं सब प्राणियों का ईश्वर हूँ। फिर भी अपनी प्रकृति को अपने वश में करके मैं अपनी माया से प्रकट होता हूँ।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि उनके और अर्जुन के अनेक जन्म बीत चुके हैं। अब वे समझाते हैं कि जो जन्म से परे है, वह भी संसार में कैसे आता है। यहाँ प्रकृति का अर्थ उनका अपना स्वभाव या सृष्टि का मूल तत्त्व है, और माया का अर्थ उनकी दिव्य सृजन-शक्ति है। अद्वैत परंपरा इसे माया के द्वारा प्रकट होना मानती है, जिससे उनका स्वरूप बदलता नहीं, जबकि वैष्णव परंपराएँ इसे उनके वास्तविक दिव्य रूप का अपनी शक्ति से प्रकट होना मानती हैं।