दूसरे लोग इन्द्रियों के सारे कर्मों को और प्राण के कर्मों को भी ज्ञान से प्रज्वलित आत्म-संयम रूपी योग की अग्नि में अर्पित कर देते हैं।
व्याख्या
कृष्ण यहाँ अलग-अलग प्रकार के यज्ञ गिना रहे हैं, यानी ऐसी साधनाएँ जो साधक को शुद्ध करती हैं। इस श्लोक में इन्द्रियों के सभी कार्य और प्राण की सभी क्रियाएँ ज्ञान से जगी हुई आत्म-संयम की भीतरी अग्नि में अर्पित की जाती हैं। टीकाकार इसे ध्यान में इन्द्रियों और प्राण को समेट लेने की साधना भी मानते हैं और पूरे जीवन के आंतरिक अनुशासन के रूप में भी पढ़ते हैं।