यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥
yajjñātvā na punarmohamevaṃ yāsyasi pāṇḍava |yena bhūtānyaśeṣeṇa drakṣyasyātmanyatho mayi ||
हे पाण्डव, इसे जान लेने पर तुम फिर कभी इस प्रकार के मोह में नहीं पड़ोगे। इसी ज्ञान से तुम समस्त प्राणियों को बिना किसी अपवाद के अपनी आत्मा में और फिर मुझमें देखोगे।
व्याख्या
पिछले श्लोक में ज्ञानी गुरुओं से सीखने की बात कही गई थी; यहाँ कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि वह ज्ञान उसे क्या देगा। इससे मोह मिट जाएगा, वही भ्रम जिसने उसे कर्तव्य के विषय में असमंजस में डाल रखा था। तब वह सब प्राणियों को अपनी आत्मा में और कृष्ण में देखेगा। इसकी व्याख्या में परंपराएँ भिन्न हैं: कुछ इसे आत्मा और परमात्मा की एकता मानती हैं, कुछ सब प्राणियों का ईश्वर में आश्रित होना।