न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥
na māṃ karmāṇi limpanti na me karmaphale spṛhā |iti māṃ yo'bhijānāti karmabhirna sa badhyate ||
कर्म मुझे लिप्त नहीं करते, और कर्म के फल में मेरी कोई लालसा नहीं है। जो मुझे इस प्रकार जान लेता है, वह कर्मों से नहीं बँधता।
व्याख्या
कृष्ण ने अभी कहा कि वे चार वर्णों की रचना करने पर भी स्वयं अकर्ता हैं। यहाँ वे कारण बताते हैं: कर्म उन्हें लिप्त नहीं करते, क्योंकि उन्हें कर्मफल की कोई स्पृहा (इच्छा) नहीं है। जो इस बात को समझकर उसी भाव से कर्म करता है, वह कर्म के बंधन में नहीं पड़ता।