हे अर्जुन, जैसे जलती हुई आग ईंधन को राख कर देती है, वैसे ही ज्ञान की अग्नि सभी कर्मों को राख कर देती है।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन से ज्ञान की महिमा कह रहे हैं। पिछले श्लोक में उन्होंने कहा कि ज्ञान की नौका से मनुष्य सारे पापों के पार जा सकता है। यहाँ "कर्मों को भस्म करने" का अर्थ है कि कर्मों के बाँधने वाले फल मिट जाते हैं। अद्वैत परंपरा इसे आत्मज्ञान से संचित कर्मफल के नष्ट होने के रूप में समझती है, जबकि भक्ति और कर्मयोग की परंपराएँ इसे ऐसे ज्ञान के रूप में पढ़ती हैं जो कर्म करते हुए भी उसके बंधन से मुक्त रखता है।