कुछ दूसरे साधक प्राण को अपान में और अपान को प्राण में अर्पित करते हैं। वे प्राण और अपान दोनों की गति को रोककर प्राणायाम में ही लगे रहते हैं।
व्याख्या
कृष्ण यज्ञ, यानी पूजा के रूप में अर्पित किए जाने वाले अनुशासित साधनों, के अलग-अलग प्रकार गिना रहे हैं। यहाँ वे प्राणायाम करने वालों का वर्णन करते हैं। ये साधक भीतर आने वाली और बाहर जाने वाली श्वास को एक-दूसरे में अर्पित करते हैं, फिर दोनों को रोककर श्वास-नियमन (प्राणायाम) में स्थिर हो जाते हैं। प्राण और अपान के अर्थ तथा श्वासों के क्रम को लेकर परंपराओं में थोड़ा मतभेद है, पर अधिकतर इसे वास्तविक योग-साधना का वर्णन मानते हैं।