जिसके सारे कार्य कामना और संकल्प से रहित होते हैं, और जिसके कर्म ज्ञान की अग्नि में जल चुके हैं, उसे ज्ञानीजन पंडित कहते हैं।
व्याख्या
कृष्ण उस व्यक्ति का वर्णन आगे बढ़ाते हैं जो कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है। वह कर्म करता है, पर कामना (काम) और फल की स्वार्थपूर्ण योजना (संकल्प) के बिना। ज्ञान की अग्नि में कर्म "जल जाते" हैं, यानी वे बाँधते नहीं। टीकाकार इस ज्ञान को आत्मबोध या विवेकपूर्ण आचरण के रूप में अलग-अलग ढंग से समझते हैं, पर सब मानते हैं कि यह कर्म को आसक्ति से मुक्त करता है।