योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम् ।आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ॥
yogasaṃnyastakarmāṇaṃ jñānasaṃchinnasaṃśayam |ātmavantaṃ na karmāṇi nibadhnanti dhanañjaya ||
हे धनञ्जय! जिसने योग के द्वारा कर्मों का त्याग कर दिया है, जिसके संशय ज्ञान से कट चुके हैं और जो आत्मा में स्थित है, उस व्यक्ति को कर्म नहीं बाँधते।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन से कर्म और ज्ञान की अपनी शिक्षा समेट रहे हैं; इससे ठीक पहले उन्होंने कहा था कि संशय से भरा मनुष्य नष्ट हो जाता है। यहाँ वे मुक्त व्यक्ति का वर्णन करते हैं: जिसने योग (अनुशासित साधना) के द्वारा कर्मों का त्याग किया है, जिसके संशय ज्ञान से कट गए हैं और जो आत्मा में स्थित है। ऐसा व्यक्ति कर्म करता है, पर कर्म उसे बाँधते नहीं। कर्मयोग की परंपरा में इस 'त्याग' का अर्थ कर्मफल और उसकी आसक्ति का त्याग माना जाता है, जबकि अद्वैत की व्याख्या में ज्ञान के द्वारा स्वयं कर्म का त्याग।