यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥
yadṛcchālābhasantuṣṭo dvandvātīto vimatsaraḥ |samaḥ siddhāvasiddhau ca kṛtvāpi na nibadhyate ||
जो अपने आप मिल जाने वाली चीज़ से संतुष्ट रहता है, द्वंद्वों से परे है, ईर्ष्या से रहित है, और सफलता तथा असफलता में समान रहता है, वह कर्म करते हुए भी बंधन में नहीं पड़ता।
व्याख्या
कृष्ण उस व्यक्ति का वर्णन जारी रखते हैं जो कर्म करते हुए भी उससे बँधता नहीं। वह बिना माँगे जो मिले उसमें संतुष्ट (यदृच्छा-लाभ) रहता है, सुख-दुख जैसे द्वंद्वों से अप्रभावित रहता है और सफलता-असफलता में समभाव रखता है। उसके कर्म के पीछे ईर्ष्या या लालसा नहीं होती, इसलिए कर्म उसे बाँधने वाला फल नहीं देता।