गुणों और कर्मों के विभाग के अनुसार मैंने चार वर्णों की व्यवस्था रची है। उसका कर्ता होते हुए भी मुझे अकर्ता और अविनाशी जानो।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि चार वर्णों की व्यवस्था (चातुर्वर्ण्य) उन्हीं की रची हुई है, और यह व्यवस्था लोगों के गुणों (प्रकृति के सत्त्व, रजस और तमस) और कर्मों के भेद पर आधारित है। कई परंपरागत टीकाकार इसे स्वभाव और योग्यता पर आधारित मानते हैं, जबकि अन्य इसे जन्म से जुड़ा समझते हैं; श्लोक स्वयं गुण और कर्म की बात कहता है। इसके रचयिता होकर भी वे अकर्ता (कर्म न करने वाले) और अविनाशी हैं, कर्म से अछूते हैं, जो अगले श्लोक की भूमिका बनता है।