हे परन्तप, द्रव्यों से किए जाने वाले यज्ञ की तुलना में ज्ञान-यज्ञ श्रेष्ठ है। क्योंकि हे पार्थ, सारे कर्म बिना किसी शेष के ज्ञान में आकर पूर्ण हो जाते हैं।
व्याख्या
कृष्ण ने अभी अनेक प्रकार के यज्ञों, यानी अनुष्ठानों और साधनाओं, का वर्णन किया है, जो कर्म-जीवन का अंग हैं। यहाँ वे कहते हैं कि द्रव्यों से किए गए यज्ञ से ज्ञान-यज्ञ श्रेष्ठ है, क्योंकि सभी कर्म अंत में ज्ञान में ही पूर्ण होते हैं। इस ज्ञान के अर्थ पर परंपराएँ भिन्न हैं: कुछ इसे आत्म-साक्षात्कार मानती हैं, तो कुछ ऐसी समझ जो कर्म को निःस्वार्थ और भक्तिमय बनाती है।