कर्म के फल की आसक्ति छोड़कर, सदा तृप्त और किसी आश्रय पर निर्भर न रहने वाला मनुष्य कर्म में पूरी तरह लगा हुआ होने पर भी वास्तव में कुछ नहीं करता।
व्याख्या
कृष्ण उस ज्ञानी का वर्णन जारी रखते हैं जो कर्म करते हुए भी उससे बँधता नहीं। वह फल की आसक्ति (फलासङ्ग) छोड़ चुका है, भीतर से सदा संतुष्ट (नित्यतृप्त) है और किसी बाहरी सहारे पर निर्भर नहीं (निराश्रय) है। निराश्रय का अर्थ कुछ टीकाकार संसार के सहारों से मुक्ति लेते हैं, तो कुछ कर्तापन या फल के दावे पर टिके न रहना। दोनों ही अर्थों में वह कर्म करता है, पर कर्म उसे बाँधता नहीं।