जो लोग कर्मों की सिद्धि चाहते हैं, वे इस संसार में देवताओं की उपासना करते हैं; क्योंकि मनुष्य-लोक में कर्म से उत्पन्न होने वाली सिद्धि शीघ्र मिल जाती है।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि लोग अलग-अलग देवताओं की उपासना क्यों करते हैं: वे अपने कर्मों का फल चाहते हैं, और मनुष्य-लोक में यह फल जल्दी मिलता है। यह पिछले श्लोक से जुड़ा है, जिसमें वे कहते हैं कि जो जैसे उनके पास आता है, वे वैसे ही उसे अपनाते हैं। कुछ टीकाकार इसे मोक्ष के ऊँचे लक्ष्य की तुलना में सीमित फल की ओर संकेत मानते हैं, जबकि अन्य इसे केवल यह कथन मानते हैं कि हर सच्ची उपासना फल देती है।