कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥
karmaṇyakarma yaḥ paśyedakarmaṇi ca karma yaḥ |sa buddhimān manuṣyeṣu sa yuktaḥ kṛtsnakarmakṛt ||
जो कर्म में अकर्म को देखता है और अकर्म में कर्म को देखता है, वही मनुष्यों में बुद्धिमान है। वही योग में स्थित है और सम्पूर्ण कर्म करने वाला है।
व्याख्या
कृष्ण कर्म की गहन गति को समझा रहे हैं। "कर्म में अकर्म" का अर्थ है कि फल की आसक्ति (सङ्ग) के बिना किया गया कर्म व्यक्ति को बाँधता नहीं; "अकर्म में कर्म" का अर्थ है कि केवल निष्क्रिय बैठना भी इच्छा और अहंकार से प्रेरित हो सकता है। परंपराओं में थोड़ा भेद है: अद्वैत व्याख्या आत्मा के अकर्ता होने पर बल देती है, जबकि कर्मयोग और भक्ति की व्याख्याएँ अनासक्त भाव से कर्म करने पर।