यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम् ॥
yadā yadā hi dharmasya glānirbhavati bhārata |abhyutthānamadharmasya tadā''tmānaṃ sṛjāmyaham ||
हे भारत, जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म का उभार होता है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।
व्याख्या
कृष्ण ने अभी कहा कि वे अजन्मा हैं, फिर भी अपनी प्रकृति के सहारे जन्म लेते हैं। यहाँ वे बताते हैं कि ऐसा कब होता है: जब धर्म, यानी नैतिक और सृष्टि की व्यवस्था, कमज़ोर पड़ता है और अधर्म बलवान होता है। "सृजामि" (मैं रचता या प्रकट करता हूँ) को परंपराएँ अलग ढंग से समझती हैं। अद्वैत इसे माया से हुआ प्राकट्य मानता है, जबकि भक्ति परंपराएँ इसे ईश्वर का वास्तविक अवतरण मानती हैं।