जो आशाओं से मुक्त है, जिसने मन और अपने आप को वश में कर लिया है और सब संग्रह त्याग दिया है, उसे केवल शरीर से कर्म करते हुए कोई दोष नहीं लगता।
व्याख्या
कृष्ण उस व्यक्ति का वर्णन जारी रखते हैं जो कर्म करते हुए भी उससे बँधता नहीं। उसमें फल की कामना (आशी) नहीं होती, मन संयमित रहता है और वह वस्तुओं के संग्रह (परिग्रह) से चिपकता नहीं। "केवल शरीर से कर्म" का अर्थ कुछ टीकाकार शरीर-निर्वाह के लिए आवश्यक क्रियाएँ मानते हैं, तो कुछ कर्तापन के भाव के बिना किया गया कर्म। दोनों ही मतों में उसे पाप या बंधन (किल्बिष) नहीं लगता।