api cedasi pāpebhyaḥ sarvebhyaḥ pāpakṛttamaḥ |sarvaṃ jñānaplavenaiva vṛjinaṃ santariṣyasi ||
यदि तुम सब पापियों में भी सबसे बड़े पापी हो, तब भी ज्ञान की नौका से ही तुम सारे पाप को पार कर जाओगे।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को भरोसा दिला रहे हैं कि आत्मा और परमात्मा का ज्ञान इतना सशक्त है कि कोई भी पिछला पाप उसे रोक नहीं सकता। वे ज्ञान को ऐसी नौका कहते हैं जो पाप और दुख (वृजिन) के सागर से पार ले जाती है। अद्वैत परंपरा इस ज्ञान को मुक्तिदायी आत्मबोध मानती है, जबकि भक्ति परंपराएँ ज्ञान के साथ कृष्ण के प्रति समर्पण पर बल देती हैं।