अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥
ajñaścāśraddadhānaśca saṃśayātmā vinaśyati |nāyaṃ loko'sti na paro na sukhaṃ saṃśayātmanaḥ ||
जो अज्ञानी है, जिसमें श्रद्धा नहीं है और जिसका मन संशय से भरा है, वह नष्ट हो जाता है। संशय में डूबे हुए मनुष्य के लिए न यह लोक है, न परलोक और न ही सुख।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने बताया कि श्रद्धावान और संयमी व्यक्ति ज्ञान पाकर परम शान्ति पाता है। यहाँ वे अर्जुन को उसके उलट स्थिति से सावधान करते हैं: अज्ञान, श्रद्धा का अभाव और संशय, जिनमें सबसे हानिकारक संशय है। संशय में डूबा मन न कर्म में स्थिर हो पाता है, न साधना में, इसलिए उसे कहीं भी सुख या आश्रय नहीं मिलता। 'नष्ट होने' को कुछ व्याख्याकार आध्यात्मिक पतन मानते हैं और कुछ जीवन के सच्चे लक्ष्य से चूक जाना।