apare niyatāhārāḥ prāṇānprāṇeṣu juhvati |sarve'pyete yajñavido yajñakṣapitakalmaṣāḥ ||
कुछ और लोग, जो आहार को नियमित रखते हैं, प्राणों को प्राणों में ही अर्पित करते हैं। ये सभी यज्ञ को जानने वाले हैं, और यज्ञ के द्वारा इनके दोष नष्ट हो चुके हैं।
व्याख्या
कृष्ण यहाँ यज्ञ, यानी अनुशासित अर्पण के अनेक रूप गिना रहे हैं। इस श्लोक में वे उन साधकों का उल्लेख करते हैं जो भोजन पर संयम रखते हैं और प्राणों को प्राणों में अर्पित करते हैं। वे कहते हैं कि ये सब यज्ञ का मर्म जानते हैं और यज्ञ से इनके दोष (कल्मष) धुल जाते हैं। टीकाकारों में मतभेद है: कुछ इसे विशेष प्राणायाम की क्रिया मानते हैं, तो कुछ इसे संयम का सामान्य प्रतीक।