ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥
brahmaṇyādhāya karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā karoti yaḥ |lipyate na sa pāpena padmapatramivāmbhasā ||
जो व्यक्ति अपने कर्मों को ब्रह्म में अर्पित करके और आसक्ति को छोड़कर कर्म करता है, वह पाप से लिप्त नहीं होता, जैसे कमल का पत्ता जल से लिप्त नहीं होता।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि कोई व्यक्ति संसार में पूरी तरह कर्म करते हुए भी भीतर से मुक्त कैसे रह सकता है। ऐसा व्यक्ति आसक्ति (सङ्ग) छोड़कर कर्म करता है और उन्हें ब्रह्म, यानी परम सत्य, को अर्पित कर देता है, इसलिए पाप उससे चिपकता नहीं, जैसे कमल के पत्ते पर जल नहीं ठहरता। टीकाकार यहाँ "ब्रह्म" का अर्थ अलग-अलग लेते हैं: कुछ इसे परमेश्वर मानते हैं जिन्हें कर्म समर्पित होते हैं, और कुछ सर्वव्यापी परम तत्त्व, जिसमें सारे कर्म घटित होते हैं।