हे अर्जुन, हे भरतश्रेष्ठ! चार प्रकार के पुण्यात्मा लोग मेरी भक्ति करते हैं: दुखी, जानने की इच्छा रखने वाला, धन या लाभ चाहने वाला, और ज्ञानी।
व्याख्या
अभी पिछले श्लोक में कृष्ण ने उन लोगों की बात की जो उनकी शरण नहीं लेते। अब वे उनकी बात करते हैं जो भक्ति करते हैं, जिन्हें वे पुण्यात्मा (सुकृतिन्) कहते हैं, और चार प्रकार बताते हैं: दुखी (आर्त), जिज्ञासु, धन या लाभ चाहने वाला (अर्थार्थी) और ज्ञानी। अगले श्लोक में बताया गया है कि वे ज्ञानी को विशेष क्यों मानते हैं।