स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।लभते च ततः कामान्मयैव विहितान् हि तान् ॥
sa tayā śraddhayā yuktastasyārādhanamīhate |labhate ca tataḥ kāmānmayaiva vihitān hi tān ||
उस श्रद्धा से युक्त होकर वह उस देवता की आराधना में लगता है और उसी से अपनी मनचाही वस्तुएँ पाता है, पर वास्तव में उनका विधान मैंने ही किया होता है।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा था कि जो भक्त जिस देवरूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उसकी श्रद्धा को वे उसी में स्थिर कर देते हैं। यहाँ वे बताते हैं कि ऐसा साधक उसी श्रद्धा से उस देवता की उपासना करता है और उसे मनचाहे फल मिलते हैं, पर उन फलों का विधान कृष्ण स्वयं करते हैं। अद्वैत और विशिष्टाद्वैत जैसी परंपराएँ इसे इस तरह समझती हैं कि सभी देवताओं के पीछे एक ही परमेश्वर फल देने वाला है, और टीकाकार इस पर अलग-अलग बल देते हैं कि अन्य देवों की उपासना कितनी सीमित है।