बुद्धिहीन लोग मुझ अव्यक्त को व्यक्त रूप में आया हुआ मानते हैं, क्योंकि वे मेरे परम स्वरूप को नहीं जानते, जो अविनाशी और सर्वोत्तम है।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने बताया कि अन्य देवताओं की उपासना का फल सीमित होता है। यहाँ वे कहते हैं कि अल्प समझ वाले (अबुद्धयः) लोग उन्हें, जो वास्तव में अव्यक्त हैं, केवल एक साधारण देहधारी समझते हैं जो अभी-अभी प्रकट हुआ हो, और उनके परम, अविनाशी स्वरूप (परं भाव) को नहीं पहचानते। परंपराओं में भेद है: अद्वैत में अव्यक्त का अर्थ निराकार ब्रह्म लिया जाता है, जबकि भक्ति परंपराएँ कृष्ण के रूप को ही नित्य और दिव्य मानती हैं।