हे पार्थ, मुझमें मन लगाकर और मेरा ही आश्रय लेकर योग का अभ्यास करते हुए तुम जिस प्रकार मुझे पूर्ण रूप से और बिना किसी संदेह के जान सकोगे, वह सुनो।
व्याख्या
यहाँ से कृष्ण अर्जुन (पार्थ, पृथा के पुत्र) को एक नया उपदेश शुरू करते हैं। वे कहते हैं कि जिसका मन उनमें लगा है (आसक्तमनाः) और जो उनका आश्रय लेकर योग, यानी अनुशासित साधना, करता है, वह उन्हें पूर्ण और निश्चित रूप से जान पाता है। अगला श्लोक इसी बात को आगे बढ़ाते हुए ज्ञान के साथ अनुभव (विज्ञान) देने का वचन देता है।