तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥
teṣāṃ jñānī nityayukta ekabhaktirviśiṣyate |priyo hi jñānino'tyarthamahaṃ sa ca mama priyaḥ ||
उनमें ज्ञानी श्रेष्ठ है, जो सदा मुझमें युक्त रहता है और जिसकी भक्ति एकनिष्ठ है। क्योंकि ज्ञानी को मैं अत्यंत प्रिय हूँ, और वह भी मुझे प्रिय है।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने भजने वाले चार प्रकार के लोग बताए: दुखी, जिज्ञासु, धन या लाभ चाहने वाला और ज्ञानी। यहाँ वे कहते हैं कि इनमें ज्ञानी सबसे श्रेष्ठ है, क्योंकि वह सदा युक्त (नित्ययुक्त) रहता है और उसकी भक्ति एकनिष्ठ (एकभक्ति) है, उसे और कुछ नहीं चाहिए। दोनों का प्रेम परस्पर है।