बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ।वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥
bahūnāṃ janmanāmante jñānavānmāṃ prapadyate |vāsudevaḥ sarvamiti sa mahātmā sudurlabhaḥ ||
अनेक जन्मों के अंत में ज्ञानवान मनुष्य मेरी शरण में आता है, यह जानकर कि यह सब कुछ वासुदेव ही है। ऐसा महात्मा अत्यंत दुर्लभ है।
व्याख्या
कृष्ण ने अभी चार प्रकार के भक्तों की बात की और ज्ञानी को विशेष बताया। यहाँ वे कहते हैं कि ऐसा ज्ञान अनेक जन्मों बाद पकता है, जब मनुष्य देखता है कि वासुदेव, यानी सबमें व्याप्त परमात्मा के रूप में कृष्ण, ही सब कुछ हैं। ऐसा महात्मा बहुत दुर्लभ है। अद्वैत परंपरा इस दर्शन को परम तत्त्व से एकता मानती है, जबकि भक्ति परंपराएँ इसे सर्वव्यापी प्रभु के प्रति प्रेममय समर्पण के रूप में पढ़ती हैं।