श्रीकृष्ण
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् । ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥
yeṣāṃ tvantagataṃ pāpaṃ janānāṃ puṇyakarmaṇām | te dvandvamohanirmuktā bhajante māṃ dṛḍhavratāḥ ||
परन्तु जिन पुण्यकर्मा लोगों का पाप समाप्त हो चुका है, वे द्वन्द्वों के मोह से मुक्त होकर दृढ़ संकल्प के साथ मेरी भक्ति करते हैं।
व्याख्या पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि इच्छा और द्वेष से उपजे द्वन्द्वों (जैसे सुख-दुःख, पसंद-नापसंद) के मोह में सब प्राणी भटकते हैं। यहाँ वे अपवाद बताते हैं: जिनके कर्म पुण्य हैं और जिनका पाप क्षीण हो गया है। वे इस मोह से छूटकर दृढ़ व्रत (दृढव्रत), यानी अडिग निश्चय, के साथ उनकी भक्ति करते हैं।
पिछला श्लोक 7.27 अध्याय 7 · ज्ञान और विज्ञान अगला श्लोक 7.29
भगवद्गीता के बारे में
भगवद्गीता, संस्कृत में श्रीमद्भगवद्गीता (Śrīmad Bhagavad Gītā ), अर्थात् “भगवान का गीत”, महाभारत के भीष्म पर्व का एक संवाद है, जिसमें 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में, युद्ध आरंभ होने से ठीक पहले, अपने ही स्वजनों से लड़ने के विचार से अर्जुन का मन टूट जाता है, और उसके सारथी श्रीकृष्ण उसे उत्तर देते हैं: कर्तव्य पर, फल की आसक्ति के बिना कर्म करने पर, ज्ञान, ध्यान और भक्ति पर। संजय यह संवाद नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र को सुनाते हैं। इसे भगवद् गीता, भगवत गीता, श्रीमद् भगवद् गीता या श्रीमद्भगवद्गीता भी लिखा जाता है, और प्रायः केवल गीता कहा जाता है।
यहाँ हर श्लोक मूल संस्कृत में है, रोमन लिप्यन्तरण, सरल भाषा में अनुवाद और एक संक्षिप्त व्याख्या के साथ — हिन्दी, अंग्रेज़ी, अरबी, स्पेनिश, फ़्रेंच और तमिल में। अनुवाद इस साइट के लिए सीधे संस्कृत से किए गए और जाँचे गए हैं; वे किसी प्रकाशित अनुवाद पर आधारित नहीं हैं। पढ़ना निःशुल्क है, बिना खाते और बिना विज्ञापन के, और आपकी प्रगति आपके ब्राउज़र में रहती है। श्लोक 1.1 से 18.78 तक गिने गए हैं, कुल 701, जिनमें अध्याय 13 के आरंभ का प्रश्न भी शामिल है।
भाषाएँ: English · हिन्दी · العربية · Español · Français · தமிழ்