साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥
sādhibhūtādhidaivaṃ māṃ sādhiyajñaṃ ca ye viduḥ |prayāṇakāle'pi ca māṃ te viduryuktacetasaḥ ||
जो लोग मुझे अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ के साथ जानते हैं, वे स्थिर चित्त वाले लोग मृत्यु के समय भी मुझे जानते हैं।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि उनका आश्रय लेने वाले ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म को जान लेते हैं। यहाँ वे तीन और शब्द जोड़ते हैं: अधिभूत (भौतिक प्राणियों का आधार), अधिदैव (देवताओं का आधार) और अधियज्ञ (यज्ञ का आधार); जो इनके साथ उन्हें जानते हैं, वे योग में स्थिर चित्त रहकर मृत्यु के समय भी उन्हें जानते हैं। इन्हीं शब्दों के बारे में अर्जुन आठवें अध्याय के आरंभ में प्रश्न पूछते हैं। इन तीन शब्दों के सटीक अर्थ पर परंपराओं में भेद है, पर सभी मानते हैं कि ऐसा ज्ञान अंतिम क्षण में भी टिका रहता है।