उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ।आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥
udārāḥ sarva evaite jñānī tvātmaiva me matam |āsthitaḥ sa hi yuktātmā māmevānuttamāṃ gatim ||
ये सभी भक्त श्रेष्ठ हैं, पर ज्ञानी तो मेरी अपनी आत्मा ही है, ऐसा मेरा मत है। क्योंकि स्थिर चित्त वाला वह ज्ञानी मुझ सर्वोत्तम गति का ही आश्रय लिए रहता है।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा था कि ज्ञानी भक्त उन्हें अत्यंत प्रिय है; यहाँ वे उसका कारण बताते हैं। उनकी शरण आने वाले सभी भक्त श्रेष्ठ (उदार) हैं, पर जिसने ज्ञान से उन्हें सचमुच पहचान लिया है और जिसका चित्त स्थिर है, उसे कृष्ण अपनी आत्मा कहते हैं, क्योंकि वह उन्हीं को परम लक्ष्य मानकर उनमें टिका रहता है। 'आत्मैव' को अद्वैत परंपरा ज्ञानी और ईश्वर की अभिन्नता के रूप में पढ़ती है, जबकि भक्ति-परंपराएँ इसे अत्यंत निकटता और प्रेम का भाव मानती हैं।