हे कुन्तीपुत्र, मैं जल में रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रभा हूँ। मैं सभी वेदों में प्रणव (ॐ) हूँ, आकाश में शब्द हूँ और मनुष्यों में पुरुषार्थ (पौरुष) हूँ।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि सब कुछ उनमें धागे में मणियों की तरह पिरोया है। अब वे अर्जुन को हर वस्तु का सार बताते हैं: जल में रस, सूर्य-चन्द्र में प्रकाश, वेदों में प्रणव (ॐ), आकाश में शब्द और मनुष्यों में पौरुष। पौरुष का अर्थ टीकाकार अलग-अलग लेते हैं: कुछ इसे पुरुषत्व या साहस मानते हैं, कुछ मनुष्य का उद्यम या सामर्थ्य।