दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥
daivī hyeṣā guṇamayī mama māyā duratyayā |māmeva ye prapadyante māyāmetāṃ taranti te ||
मेरी यह दैवी माया गुणों से बनी है और इसे पार करना बहुत कठिन है। जो लोग केवल मेरी ही शरण लेते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा था कि प्रकृति के तीन गुणों से बने भावों के कारण संसार मोहित है और उनके परम स्वरूप को नहीं पहचानता। अब वे अर्जुन से कहते हैं कि माया उनकी अपनी दिव्य शक्ति है, जो गुणों (सत्त्व, रजस् और तमस् नामक प्रकृति के तीन गुणों) से रची है, और केवल उनकी शरण से ही उसके पार जाया जा सकता है। अद्वैत परंपरा माया को भ्रम रचने वाली ईश्वर की शक्ति मानती है, जबकि वैष्णव परंपराएँ उसे ईश्वर की वास्तविक शक्ति मानती हैं।