जिनका विवेक अलग-अलग कामनाओं ने हर लिया है, वे अपने-अपने स्वभाव से बंधे हुए, तरह-तरह के नियमों का पालन करते हुए अन्य देवताओं की शरण में जाते हैं।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि सब कुछ परमात्मा रूप देखने वाला ज्ञानी दुर्लभ है। यहाँ वे उन लोगों की बात करते हैं जिनका विवेक (ज्ञान) अनेक कामनाओं से ढक गया है और जो अपने स्वभाव (प्रकृति) के अनुसार अन्य देवताओं की उपासना करते हैं। कुछ व्याख्याकार "अन्य देवता" को परमेश्वर से भिन्न छोटे देव मानते हैं, तो कुछ उन्हें उसी एक परमात्मा के सीमित उद्देश्य से पूजे गए रूप मानते हैं।