यह तो अपरा (निम्न) प्रकृति है। हे महाबाहो, इससे भिन्न मेरी एक और प्रकृति को जानो, जो परा (श्रेष्ठ) है और जीव के रूप में है, जिसके द्वारा यह जगत धारण किया जाता है।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने अपनी जड़ प्रकृति के आठ भेद बताए: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार। यहाँ वे कहते हैं कि इससे श्रेष्ठ एक और प्रकृति है, जीव (जीवभूता), जो इस जगत को धारण करती है। अनेक व्याख्याकार इसे चेतन आत्मा मानते हैं जो जड़ से भिन्न है, जबकि कुछ इसे सब प्राणियों में प्राण भरने वाली ईश्वरीय शक्ति के रूप में समझते हैं।