nāhaṃ prakāśaḥ sarvasya yogamāyāsamāvṛtaḥ |mūḍho'yaṃ nābhijānāti loko māmajamavyayam ||
मैं सबके सामने प्रकट नहीं होता, क्योंकि योगमाया से ढका रहता हूँ। यह मोहग्रस्त संसार मुझ अजन्मा और अविनाशी को नहीं पहचान पाता।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा था कि अज्ञानी लोग उन्हें केवल साधारण देहधारी समझते हैं। यहाँ वे अर्जुन को बताते हैं कि इसका कारण उनकी योगमाया है, यानी उनकी दिव्य शक्ति, जो उनके वास्तविक स्वरूप को लोगों की दृष्टि से ढक देती है। इसी कारण मोहित लोग उन्हें जन्म और नाश से परे नहीं जान पाते। अद्वैत परंपरा इसे ईश्वर की माया-शक्ति मानती है, जबकि वैष्णव परंपराएँ इसे भगवान की अपनी दिव्य शक्ति मानती हैं, जो उन्हें बाँधती नहीं।