न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥
na māṃ duṣkṛtino mūḍhāḥ prapadyante narādhamāḥ |māyayāpahṛtajñānā āsuraṃ bhāvamāśritāḥ ||
बुरे कर्म करने वाले, मोहग्रस्त और नीच प्रवृत्ति के लोग मेरी शरण में नहीं आते। माया ने उनका ज्ञान हर लिया है, और वे आसुरी स्वभाव का आश्रय लिए रहते हैं।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि उनकी दैवी माया पार करना कठिन है और केवल उनकी शरण लेने वाले ही उसे पार करते हैं। यहाँ वे बताते हैं कि कौन शरण नहीं लेता: जो बुरे कर्म करते हैं, मोहित हैं और जिनका विवेक माया ने हर लिया है, वे आसुरी भाव यानी अहंकार और भोग-प्रधान दृष्टि में टिके रहते हैं। टीकाकार इस पर भिन्न मत रखते हैं कि ये स्थायी प्रकार के लोग हैं या ऐसी प्रवृत्तियाँ जो किसी में भी हो सकती हैं और बदली जा सकती हैं।