बलवानों में मैं वह बल हूँ जो कामना और आसक्ति से रहित है; और हे भरतश्रेष्ठ, प्राणियों में मैं वह कामना हूँ जो धर्म के विरुद्ध नहीं है।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि वे सब वस्तुओं के मूल में कैसे विद्यमान हैं: यहाँ वे कामना (काम) और आसक्ति (राग) से मुक्त शुद्ध बल हैं, और वह इच्छा हैं जो धर्म (उचित व्यवस्था और कर्तव्य) की मर्यादा में रहती है। संकेत यह है कि स्वाभाविक इच्छाएँ, जैसे जीवन-निर्वाह या परिवार की कामना, धर्म के अनुकूल हों तो दोषपूर्ण नहीं हैं। टीकाकार इस पर भिन्न मत रखते हैं कि यह धर्मसम्मत कामना केवल संतानोत्पत्ति जैसी बातों तक सीमित है या सभी धर्मसम्मत लक्ष्यों तक, पर सभी मानते हैं कि बेलगाम लालसा इसमें शामिल नहीं है।