ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ।मत्त एवेति तान्विद्धि नत्वहं तेषु ते मयि ॥
ye caiva sāttvikā bhāvā rājasāstāmasāśca ye |matta eveti tānviddhi natvahaṃ teṣu te mayi ||
जो भी भाव सात्त्विक हैं, जो राजस हैं और जो तामस हैं, उन्हें तुम मुझसे ही उत्पन्न जानो। फिर भी मैं उनमें नहीं हूँ; वे मुझमें हैं।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि सब कुछ उन पर ही आश्रित है। प्रकृति के तीन गुणों — सत्त्व यानी प्रकाश, रजस् यानी चंचल आवेग और तमस् यानी जड़ता — से बने सभी भाव उन्हीं से उत्पन्न होते हैं। वे कहते हैं कि वे इन भावों के अधीन नहीं हैं, बल्कि ये उनमें स्थित हैं; कुछ व्याख्याकार इसमें प्रकृति से ईश्वर की निर्लिप्तता पर बल देखते हैं, तो कुछ प्रकृति में उनकी गहरी उपस्थिति पर।