योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ।श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥
yogināmapi sarveṣāṃ madgatenāntarātmanā |śraddhāvānbhajate yo māṃ sa me yuktatamo mataḥ ||
सभी योगियों में भी जो श्रद्धा से युक्त होकर, मुझमें लगे हुए अन्तःकरण से मेरा भजन करता है, वह मेरे मत में सबसे श्रेष्ठ योगी है।
व्याख्या
यह छठे अध्याय का अंतिम श्लोक है। पिछले श्लोक में कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि योगी (योग के अभ्यास से परमात्मा से जुड़ने वाला) तपस्वियों, ज्ञानियों और कर्मकांडियों से श्रेष्ठ है। अब वे सर्वश्रेष्ठ योगी का लक्षण बताते हैं: जो श्रद्धा के साथ, पूरी तरह उनमें डूबे हुए अंतःकरण से उनका भजन करता है। भक्ति-परंपराएँ यहाँ 'मुझ' को साकार भगवान मानती हैं, जबकि अद्वैत-परंपराएँ इसे परम आत्मा के अर्थ में पढ़ती हैं।