श्रीकृष्ण
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव । न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥
yaṃ saṃnyāsamiti prāhuryogaṃ taṃ viddhi pāṇḍava | na hyasaṃnyastasaṅkalpo yogī bhavati kaścana ||
जिसे लोग संन्यास कहते हैं, उसी को तुम योग समझो, हे पाण्डव। क्योंकि संकल्पों को त्यागे बिना कोई भी योगी नहीं होता।
व्याख्या पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा था कि फल की आसक्ति छोड़कर कर्म करने वाला ही संन्यासी और योगी है। यहाँ वे अर्जुन से कहते हैं कि संन्यास और योग (कर्म का अनुशासन) भीतर से एक ही हैं। दोनों में मूल बात है स्वार्थपूर्ण योजनाओं और कामनाओं यानी संकल्पों को छोड़ देना।
पिछला श्लोक 6.1 अध्याय 6 · ध्यान का मार्ग अगला श्लोक 6.3
भगवद्गीता के बारे में
भगवद्गीता, संस्कृत में श्रीमद्भगवद्गीता (Śrīmad Bhagavad Gītā ), अर्थात् “भगवान का गीत”, महाभारत के भीष्म पर्व का एक संवाद है, जिसमें 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में, युद्ध आरंभ होने से ठीक पहले, अपने ही स्वजनों से लड़ने के विचार से अर्जुन का मन टूट जाता है, और उसके सारथी श्रीकृष्ण उसे उत्तर देते हैं: कर्तव्य पर, फल की आसक्ति के बिना कर्म करने पर, ज्ञान, ध्यान और भक्ति पर। संजय यह संवाद नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र को सुनाते हैं। इसे भगवद् गीता, भगवत गीता, श्रीमद् भगवद् गीता या श्रीमद्भगवद्गीता भी लिखा जाता है, और प्रायः केवल गीता कहा जाता है।
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