श्रीकृष्ण
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः । शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥
prāpya puṇyakṛtāṃ lokānuṣitvā śāśvatīḥ samāḥ | śucīnāṃ śrīmatāṃ gehe yogabhraṣṭo'bhijāyate ||
योग से भटका हुआ साधक पुण्य करने वालों के लोकों को पाता है और वहाँ बहुत लंबे वर्षों तक रहता है। फिर वह पवित्र और समृद्ध लोगों के घर में जन्म लेता है।
व्याख्या अर्जुन को चिंता थी कि जो साधक योग शुरू करके उसे पूरा नहीं कर पाता, उसका क्या होता है। कृष्ण बताते हैं कि वह पहले पुण्यात्माओं के लोकों का सुख भोगता है, फिर किसी अच्छे और सुखी परिवार में जन्म लेता है। टीकाकार प्रायः "शाश्वत वर्षों" (शाश्वतीः समाः) का अर्थ बहुत लंबा समय मानते हैं, अनंत काल नहीं।
पिछला श्लोक 6.40 अध्याय 6 · ध्यान का मार्ग अगला श्लोक 6.42
भगवद्गीता के बारे में
भगवद्गीता, संस्कृत में श्रीमद्भगवद्गीता (Śrīmad Bhagavad Gītā ), अर्थात् “भगवान का गीत”, महाभारत के भीष्म पर्व का एक संवाद है, जिसमें 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में, युद्ध आरंभ होने से ठीक पहले, अपने ही स्वजनों से लड़ने के विचार से अर्जुन का मन टूट जाता है, और उसके सारथी श्रीकृष्ण उसे उत्तर देते हैं: कर्तव्य पर, फल की आसक्ति के बिना कर्म करने पर, ज्ञान, ध्यान और भक्ति पर। संजय यह संवाद नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र को सुनाते हैं। इसे भगवद् गीता, भगवत गीता, श्रीमद् भगवद् गीता या श्रीमद्भगवद्गीता भी लिखा जाता है, और प्रायः केवल गीता कहा जाता है।
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